Sunday, 5 October 2014


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Monday, 28 July 2014

इहै अखिल भारतीय है भइया



पिछले दिनों एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में जाने को मिला। मंच पर इलाहाबाद के तीन, फैजाबाद के एक, कानपुर के एक और इलाहाबाद के आस-पास के इलाकों के दो-चार और कवियों के नाम पुकारते हुए मंच पर बैठाया गया। दो-तीन के अलावा किसी को भी कभी नहीं सुना था। अगल-बगल बैठे श्रोता तो उन दो-तीन को भी नहीं जानते थे। अब आप ही बताइए कि ऐसे कवि सम्मेलन को अखिल भारतीय कवि सम्मेलन कहना कहां तक उचित है कि जिसमें उत्तर प्रदेश से बाहर के कवि ही न हों, जिसमें किसी अन्य भारतीय भाषा के कवि न हों और जिसमें बैठे कवियों को अधिकांश श्रोता जानते ही न हों। भइया नामकरण से पहले औकात तो देख लिया करो अपने आयोजन की। काहे 'अखिलÓ शब्द के मायने की धज्जी उड़ावे पर तुले हो।

उन्हें इतना गुमान क्यों?



आखिर लेखकीय संगठनों के अधिकांश लोगों को इतना गुमान क्यों है? अरे भाई आप किसी को नकार ही तो सकते हैं। नकारिए, लेकिन किसी की हस्ती तो नहीं मिटा सकते। आपका सदस्य न होने का मतलब यह तो नहीं कि अगला किसी तरह का सृजन करने लायक ही नहीं है। आप किसी मुद्दे पर बहस करने के लिए भी तैयार नहीं हैं, जबकि आपके अपने भीतर ही असंतोष पनपा हुआ है। अब देखिए न, आपने अपने बीच के किसी ऐसे लेखक या कवि की कृतियों पर चर्चा कभी कराई जिसे बहुत से लोग नहीं जानते। नहीं कराई। लोगों में यही घारणा बनती जा रही है कि आप तो महज दिखावे और खानापूर्ति के संगठन हैं, जो महज अपने होने का विश्वास दिलाने की जिद लिए बैठे हैं। अरे दिल बड़ा कीजिए और लेखक की तरह बिहेव कीजिए, किसी राजनीतिज्ञ की तरह या फिर साहित्यिक माफिया या क्षत्रप की तरह नहीं। सबको ....दे भगवान।

Saturday, 14 May 2011

आवारा फूलों से मुलाकात


रेल यात्राओं का अपना अलग ही सुख है। शहर और शहर का मार्केट, गांव और गांव का कल्चर, लोग और लोगों के रहन-सहन, प्रकृति और उसके तमाम लटके-झटके....। ऐसा ही बहुत कुछ इन यात्राओं में मुफ्त में मुहैया होता रहता है। पिछले दिनों ऐसी ही एक यात्रा में मेरी मुलाकात आवारा फूलों से हो गयी। रेलवे क्रीपर के बैंगनी फूलों के साथ कई-कई रंगों की छटा बिखेरते ये फूल बेहद खूबसूरत लग रहे थे। देखा तो मैंने उन्हें पहले भी कई बार था, लेकिन उनसे मुलाकात करने की पहल मैंने पहली बार की। रेलवे ट्रैक के दोनों तरफ अपनी उपस्थिति दर्ज कराते इन फूलों की आवारगी में एक अलग तरह की कशिश थी और वह मुझे लगातार आकर्षित कर रही थी। तो क्या हुआ इनमें सुगन्ध नहीं है, रंग-रूप तो इनके पास है ही। सच तो यह है कि सुगन्ध को छोडक़र ये फूल होने की सभी शर्तें पूरी कर रहे हैं।

पता नहीं मैं इन्हें आवारा कहकर ठीक कर रहा हूं या नहीं। कह तो मैं इन्हें बेसहारा भी सकता था, लेकिन जो खुद ही खुद को सहारा देने में सक्षम दिख रहे हों उन्हें बेसहारा कहना बेमानी सा लगा। मैं इन्हें अनाथ भी नहीं कहना चाहता। ऐसा इसलिए कि हमारी प्रकृति इन्हें पालती-पोसती है और वह भी बिना हमारे किसी सहयोग के। मेरा इन्हें आवारा कहने का निहितार्थ महज इतना है कि उनका मुक्त होकर अपनी ही रौ में एक अजब सी ठसक के साथ रहना। इनका यही अंदाज मुझे भा सा गया। ये मुझे अपनी मस्ती में दिखे। खिलखिलाते हंसते हुए, अपने रंग में मुझे रंगते हुए। मैंने ट्रेन से उतरकर इन्हें छुआ तो लगा कि ये ठीक-ठीक उसी तरह हैं, जैसे बाकी के फूल। ट्रेन बहुत देर इन फूलों के पास नहीं रुकी, आगे बढ़ गयी। पर न जाने क्यों इस यात्रा में जब-जब मैंने चलती ट्रेन की खिडक़ी से बाहर देखने की कोशिश की, तब-तब मुझे मेरे आवारा फूल दिख ही गये।

बहुत दिनों पहले एक फिल्मी गीत जुबान पर अकसर आ जाया करता था। ठीक-ठीक तो नहीं याद आ रहा, लेकिन कुछ इस तरह था- ‘आवारा हूं.. ..गर्दिश में हूं पर आसमान का तारा हूं.. .. आवारा हूं.. .. ’ , मुझे यह गीत इन फूलों पर एकदम फिट होता लगा। कितने मस्त हैं ये। कितने चिंता मुक्त। अपने होने या न होने की कोई परवाह नहीं और न ही किसी और को ही। इनका एकमात्र काम जो इन्हें देखते ही समझ में आता है, वह यह कि सायास या फिर अनायास ये रेलवे ट्रैक की खूबसूरती बढ़ाने का है। मेरे एक सहयात्री, जो अनायास ही मेरी इन फूलों के प्रति उपजी संवेदना के सहभागी बन गये थे, ने बताया कि इन फूलों में से कई मेडिसिनल वेल्यू भी रखते हैं। वाह! यह तो आवारगी को पुख्ता करने की एक और बात सामने आ गयी। मुझे याद है कि मेरे मोहल्ले में अकेले रहने वाले एक बुजुर्ग को जरूरत पडऩे पर अस्पताल पहुंचाने का काम मोहल्ले में आवारा कहे जाने वाले दो लडक़ों ने ही किया था। अगर उन्हें समय पर अस्पताल न ले जाया जाता तो शायद उन्हें बचा पाना मुश्किल हो जाता। उस दिन बाकी के लडक़े यानी हम सब कालेज या विश्वविद्यालय गये हुए थे। लौटने पर हर कोई उनके इस काम की तारीफ कर रहा था, लेकिन उन्हें आवारा के सम्बोधन के साथ। कहा यह भी गया कि आवारा लोग भी कभी-कभी बड़ा काम कर जाते हैं। फिलहाल मुझे अपना वह सहयात्री बहुत भला लगा, जिसने मेरे अपने हो गये आवारा फूलों को काम का बताया था।

आवारा फूलों के बारे में सोचते हुए मेरी यात्रा कब खत्म हो गयी, मुझे पता ही नहीं चला। यह एक पिछड़े इलाके का छोटा सा स्टेशन था। मैं यहां फोक आर्टिस्टों से मिलने पहुंचा था। स्टेशन पर उतरते ही मुझे कुछ भीख मांगने वाले बच्चों ने घेर लिया। मैं उन्हें झिडक़ता कि उससे पहले मुझे मेरी यात्रा के सहभागी बने आवारा फूल याद आ गये। .. ..और फिर.. .. मैं उन बच्चों को कैंटीन तक ले गया और सबके साथ मैंने आइसक्रीम खायी।

Saturday, 9 May 2009

कस गुरू सुन्यो....

बड़े दिन बाद सब दिग्गज एकै मंच पर नजर आवै वाले हैं। अब सोचो जरा कि जब मंच पर अमरकांत, मारकण्डेय, कालिया, दूधनाथ और शेखर जोशी जैसे कथाकार नजर अइहैं तो कैसा लगी। वरधा से चलकर इहां हिन्दी विश्वविद्यालय आवा है और अपनी क्षेत्रीय इकाई खोल रहा है।वही के आयोजन में सब जुट रहे हैं।
अमें विभूति नारायन राय कुलपति हैं तो ई तो होना ही रहा।
बात ई नय न में। बात इन दिग्गजों के एक मंच पर बइठे की है। अब ई न कह्यो कि एमें कउन अनोखी बात है।
अमें ई तो हम कहै वाले रहे।
हम जानत रहे कि तुम्हे हमरी बात पची नय। अमें अब याद करो जब नमो अंधकार छपा रहा और ओका फोटोस्टेट पूरे शहर में बटवावा जात रहा। ई साहितिक लहकटई करै वाले और भोगे वालन का नाम भी तुम्हे याद होबै करी। अमें उन दिनों ई वाला मामला हर किसी की जुबान पर रहत रहा। अब इहै लोग......।
अमें एक बात ई भी तो है कि बहुत दिनों से ई तरह सजा भवा मंच भी देखै को नय मिला है।
हां में सूनेपन की मार झेल रहे ई शहर के लिए तो ई तरह का आयोजन होना ही बड़ी बात है।
तो गुरू मिलो 9 मई की शाम एजी अड्डे के पास। वहीं से चलबै वाई एम सी ए के सामने।

Wednesday, 6 May 2009

तो अब बारी व्लागरन की

लेयो में जेका डर रहा, वही होय गवा। साहित्यकारन के शहर में व्लागर जुटे लगें। अब ई अपनी बात कहे के लिए मंच पर नजर अइहैं। ताजा हवा नाम की संस्था अपने इलाहाबाद में एक शाम व्लागरों के नाम का आयोजन कर रही है। ई आयोजन में देश के कई नामचीन और गैरनामचीन व्लागर जुटिहैं और अपनी बात रखिहैं। बड़ी बात यह है कि अब व्लागर केवल लहकटई नय करतें, कुछ गम्भीर लेखन भी होय रहा है। ई लिए आयोजन के मायने है। तो फिर निराला सभागार में 8 मई को शाम 5.30 बजे होय वाले ई आयोजन में दिखबो कि नय। अब ई न कह्यो कि कउनो कुत्ता काटे है कि हम आपन समय खराब करी। काहे कि हम तो रहबै करबै। अमें ई तरह का आयोजन जल्दी न होई।

Monday, 22 December 2008

अमें यार सुन्यो

इलहाबाद विश्विद्यालय के सेन्टर आफ फोटोजनॅलिज्म विभाग में दिल्ली से निकल रही पत्रिका वाक ने टेलेन्ट हन्ट करिस तो ढेर सारे छात्र कवि सामने आय गये। कथाकार मारकण्डेय इस टेलेन्ट हन्ट की अध्यक्षता करिन। एके कैम्पस संयोजक धनंजय चोपड़ा रहें। एमें एक से बढ़कर एक कविता सामने आयीं। उपसिथत रहे वालन में यश मालवीय व गोपाल रंजन शामल रहें।