Monday, 28 July 2014

इहै अखिल भारतीय है भइया



पिछले दिनों एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में जाने को मिला। मंच पर इलाहाबाद के तीन, फैजाबाद के एक, कानपुर के एक और इलाहाबाद के आस-पास के इलाकों के दो-चार और कवियों के नाम पुकारते हुए मंच पर बैठाया गया। दो-तीन के अलावा किसी को भी कभी नहीं सुना था। अगल-बगल बैठे श्रोता तो उन दो-तीन को भी नहीं जानते थे। अब आप ही बताइए कि ऐसे कवि सम्मेलन को अखिल भारतीय कवि सम्मेलन कहना कहां तक उचित है कि जिसमें उत्तर प्रदेश से बाहर के कवि ही न हों, जिसमें किसी अन्य भारतीय भाषा के कवि न हों और जिसमें बैठे कवियों को अधिकांश श्रोता जानते ही न हों। भइया नामकरण से पहले औकात तो देख लिया करो अपने आयोजन की। काहे 'अखिलÓ शब्द के मायने की धज्जी उड़ावे पर तुले हो।

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