रेल यात्राओं का अपना अलग ही सुख है। शहर और शहर का मार्केट, गांव और गांव का कल्चर, लोग और लोगों के रहन-सहन, प्रकृति और उसके तमाम लटके-झटके....। ऐसा ही बहुत कुछ इन यात्राओं में मुफ्त में मुहैया होता रहता है। पिछले दिनों ऐसी ही एक यात्रा में मेरी मुलाकात आवारा फूलों से हो गयी। रेलवे क्रीपर के बैंगनी फूलों के साथ कई-कई रंगों की छटा बिखेरते ये फूल बेहद खूबसूरत लग रहे थे। देखा तो मैंने उन्हें पहले भी कई बार था, लेकिन उनसे मुलाकात करने की पहल मैंने पहली बार की। रेलवे ट्रैक के दोनों तरफ अपनी उपस्थिति दर्ज कराते इन फूलों की आवारगी में एक अलग तरह की कशिश थी और वह मुझे लगातार आकर्षित कर रही थी। तो क्या हुआ इनमें सुगन्ध नहीं है, रंग-रूप तो इनके पास है ही। सच तो यह है कि सुगन्ध को छोडक़र ये फूल होने की सभी शर्तें पूरी कर रहे हैं।
पता नहीं मैं इन्हें आवारा कहकर ठीक कर रहा हूं या नहीं। कह तो मैं इन्हें बेसहारा भी सकता था, लेकिन जो खुद ही खुद को सहारा देने में सक्षम दिख रहे हों उन्हें बेसहारा कहना बेमानी सा लगा। मैं इन्हें अनाथ भी नहीं कहना चाहता। ऐसा इसलिए कि हमारी प्रकृति इन्हें पालती-पोसती है और वह भी बिना हमारे किसी सहयोग के। मेरा इन्हें आवारा कहने का निहितार्थ महज इतना है कि उनका मुक्त होकर अपनी ही रौ में एक अजब सी ठसक के साथ रहना। इनका यही अंदाज मुझे भा सा गया। ये मुझे अपनी मस्ती में दिखे। खिलखिलाते हंसते हुए, अपने रंग में मुझे रंगते हुए। मैंने ट्रेन से उतरकर इन्हें छुआ तो लगा कि ये ठीक-ठीक उसी तरह हैं, जैसे बाकी के फूल। ट्रेन बहुत देर इन फूलों के पास नहीं रुकी, आगे बढ़ गयी। पर न जाने क्यों इस यात्रा में जब-जब मैंने चलती ट्रेन की खिडक़ी से बाहर देखने की कोशिश की, तब-तब मुझे मेरे आवारा फूल दिख ही गये।
बहुत दिनों पहले एक फिल्मी गीत जुबान पर अकसर आ जाया करता था। ठीक-ठीक तो नहीं याद आ रहा, लेकिन कुछ इस तरह था- ‘आवारा हूं.. ..गर्दिश में हूं पर आसमान का तारा हूं.. .. आवारा हूं.. .. ’ , मुझे यह गीत इन फूलों पर एकदम फिट होता लगा। कितने मस्त हैं ये। कितने चिंता मुक्त। अपने होने या न होने की कोई परवाह नहीं और न ही किसी और को ही। इनका एकमात्र काम जो इन्हें देखते ही समझ में आता है, वह यह कि सायास या फिर अनायास ये रेलवे ट्रैक की खूबसूरती बढ़ाने का है। मेरे एक सहयात्री, जो अनायास ही मेरी इन फूलों के प्रति उपजी संवेदना के सहभागी बन गये थे, ने बताया कि इन फूलों में से कई मेडिसिनल वेल्यू भी रखते हैं। वाह! यह तो आवारगी को पुख्ता करने की एक और बात सामने आ गयी। मुझे याद है कि मेरे मोहल्ले में अकेले रहने वाले एक बुजुर्ग को जरूरत पडऩे पर अस्पताल पहुंचाने का काम मोहल्ले में आवारा कहे जाने वाले दो लडक़ों ने ही किया था। अगर उन्हें समय पर अस्पताल न ले जाया जाता तो शायद उन्हें बचा पाना मुश्किल हो जाता। उस दिन बाकी के लडक़े यानी हम सब कालेज या विश्वविद्यालय गये हुए थे। लौटने पर हर कोई उनके इस काम की तारीफ कर रहा था, लेकिन उन्हें आवारा के सम्बोधन के साथ। कहा यह भी गया कि आवारा लोग भी कभी-कभी बड़ा काम कर जाते हैं। फिलहाल मुझे अपना वह सहयात्री बहुत भला लगा, जिसने मेरे अपने हो गये आवारा फूलों को काम का बताया था।
आवारा फूलों के बारे में सोचते हुए मेरी यात्रा कब खत्म हो गयी, मुझे पता ही नहीं चला। यह एक पिछड़े इलाके का छोटा सा स्टेशन था। मैं यहां फोक आर्टिस्टों से मिलने पहुंचा था। स्टेशन पर उतरते ही मुझे कुछ भीख मांगने वाले बच्चों ने घेर लिया। मैं उन्हें झिडक़ता कि उससे पहले मुझे मेरी यात्रा के सहभागी बने आवारा फूल याद आ गये। .. ..और फिर.. .. मैं उन बच्चों को कैंटीन तक ले गया और सबके साथ मैंने आइसक्रीम खायी।